पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के अलावा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। मामला शिवसेना में विभाजन से जुड़ी कई याचिकाओं से संबंधित है। इनमें निर्वाचन आयोग के उस फैसले को चुनौती भी शामिल है, जिसमें एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को वास्तविक शिवसेना माना गया था और उसे धनुष-बाण चुनाव चिह्न दिया गया था।मंगलवार को शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने दलीलें रखीं। कौल ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए निर्वाचन आयोग के विधायी बहुमत के आधार पर फैसला करने का बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह परीक्षण राजनीतिक दल की पहचान तय करने के लिए कानूनी रूप से वैध और प्रासंगिक बना हुआ है। यह निर्धारण चुनाव चिह्न आदेश के तहत किया जा सकता है।न्यायमूर्ति बागची ने सवाल किया कि ऐसी स्थिति में पार्टी के चुनाव चिह्न का इस्तेमाल कैसे होना चाहिए, जब जिन सदस्यों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही चल रही है, वे बाद में अपनी सदस्यता खो देते हैं। उन्होंने पूछा, “क्या चुनाव चिह्न की भावना उन लोगों के लिए लागू होगी, जिन्होंने सांविधानिक पाप किया है, या उन लोगों के लिए जो इस सांविधानिक पाप की शिकायत कर रहे हैं?“न्यायमूर्ति बागची ने संगठन के सदस्यों की संख्या के आधार पर जमीनी समर्थन तय करने के तरीके पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि भारतीय राजनीति की उलझी हुई स्थिति में केवल संगठनात्मक सदस्यों की संख्या के आधार पर वास्तविक जमीनी समर्थन का आकलन करना मुश्किल हो सकता है। कौल ने एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उसमें यह नहीं कहा गया था कि अयोग्यता का प्रभाव जरूरी तौर पर पिछली तारीख से लागू होगा।उन्होंने कहा कि संबंधित फैसला उस …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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