बिहार को इतिहास, धर्म और आध्यात्मिक परंपराओं की धरती कहा जाता है। यही वह भूमि है जहां राजनीति के गुरु चाणक्य हुए और भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। बिहार में एक ऐसी जगह भी है, जिसे पितरों के मोक्ष की धरती माना जाता है। हम बात कर रहे हैं पटना जिले से सटे पुनपुन नदी घाट की। आमतौर पर पितृपक्ष में पिंडदान के लिए गया का नाम सबसे पहले लिया जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पुनपुन में भी पितरों का तर्पण और पिंडदान किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गया में पिंडदान से पहले पुनपुन में तर्पण करने की परंपरा रही है। इसी वजह से पुनपुन को मोक्ष का प्रथम द्वार भी कहा जाता है। इस बार 26 सितंबर से पुनपुन पितृपक्ष मेला 2026 की शुरुआत होगी, जो 10 अक्टूबर तक चलेगा। मेले को लेकर जिला प्रशासन की ओर से तैयारियां जोर-शोर से की जा रही हैं। पुनपुन नदी घाट से जुड़ी कई पौराणिक मान्यताएं हैं। गरुड़ पुराण में पुनपुन नदी को आदि गंगा के नाम से भी बताया गया है। मान्यता है कि भगवान राम अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए माता जानकी के साथ पुनपुन नदी घाट पहुंचे थे। उन्होंने यहां सबसे पहले अपने पूर्वजों के लिए पिंड का तर्पण किया था। इसके बाद भगवान राम गया पहुंचे और फल्गु नदी के तट पर पूरे विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण किया। इसी मान्यता के कारण पुनपुन को गया से पहले पिंडदान का स्थान और मोक्ष का पहला द्वार माना जाता है।हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष में 15 दिनों तक पितरों का तर्पण और श्राद्ध किया जाता है। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से पिंडदान करते हैं। इस बार पुनपुन में पितृपक्ष मेला 26 सितंबर से शुरू होक …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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