पूर्णिमा त्रिपाठी: जो सिर्फ सत्ता देखकर पाला बदलते हैं वो कहीं भी रहेंगे पार्टी के लिए खतरा तो रहेंगे ही। हमने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ये देखा। आज ममता के साथ हुआ तो कल किसी और के साथ नहीं होगा ऐसा कोई नहीं कह सकता है। कल को ये भाजपा के साथ नहीं होगा इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। मुझे लगता है कि इसे रोकने के लिए तत्काल सदस्यता जाने जैसे प्रावधान लाने होंगे। राकेश शुक्ल: ये नैतिकता और सिद्धांत का विषय है। जिस दिन राजनीतिक दलों में नैतिकता आ जाएगी और वो के सिद्धांत को अपनाएंगी तो इस तरह के किसी कानून की जरूरत नहीं पड़ेगी। सभी राजनीतिक दलों को एक सिद्धांत तय करेगा। आज जरूरत ये नहीं है कि कानून को सख्त किया जाए, लेकिन ये राजनीतिक दलों को तय करना पड़ेगा। क्योंकि दंड ही हर चीज का समाधान नहीं होता है। अजय सेतिया: पार्टियां किसी की मिल्कियत जैसे हो गई हैं। अगर ये खत्म हो जाए तो किसी को दलबदल की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। नैतिकता का जहां तक सवाल है तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार तक के समय तक के उदाहण आपको मिलेंगे। उसके बाद के दौर में नैतिकता का सियासत में कोई स्थान नहीं रह गया। दलबदल कानून को बदलने या उसे कठोर या ढीला करने के बजाय पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र पर काम किया जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। विनोद अग्निहोत्री: दलबदल कानून तब बना था जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। तब उनके पास 400 से ज्यादा सांसद थे। यानी, उनके दल के पास टूटने का खतरा नहीं था। अटल बिहारी वाजपेयी के समय इसमें संसोधन हुआ और एक तिहाई की जगह दो तिहाई वाला प्रावधान आया। लोकतंत्र की बात करें तो किस पार्टी में आंतरिक लोकतांत्रिक है ये देखना होगा। कुछ एक उदाहरण के आलाव आपको …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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