विशेषज्ञों की चेतावनी क्या है? विशेषज्ञों की चिंता मुख्य रूप से दो चीजों को लेकर है, मौसम और घरेलू आपूर्ति। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में चीनी की आपूर्ति पहले से दबाव में है। अगर बारिश कमजोर रहती है तो गन्ने की अगली फसल प्रभावित हो सकती है। इसका असर आने वाले चीनी मौसम में उत्पादन पर पड़ सकता है। इसके अलावा एथेनॉल नीति को लेकर भी संतुलन जरूरी है। सरकार के लिए एथेनॉल उत्पादन बढ़ाना ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, लेकिन खाद्य जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार का क्या कहना है? दावा किया जा रहा था कि पेट्रोल में मिश्रण के लिए चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर डाइवर्ट किए जाने से घरेलू बाजार में इसकी कीमतें बढ़ रही हैं। हालांकि, खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने शुक्रवार को एक आधिकारिक बयान जारी कर इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। सरकार ने स्पष्ट किया है कि कीमतों में बढ़ोतरी का संबंध इथेनॉल से नहीं, बल्कि कम घरेलू उत्पादन, आगामी त्योहारी सीजन की मांग और जमाखोरी से है। साथ ही गन्ने की फसल को रेड रॉट और टॉप बोरर बीमारी से नुकसान हुआ। इस सीजन में चीनी का उत्पादन करीब 306 लाख मीट्रिक टन (LMT) रहने का अनुमान है, जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों का शुरुआती अनुमान करीब 343 एलएमटी था। सरकार ने आंकड़ों के साथ स्पष्ट किया है कि इथेनॉल कार्यक्रम पर महंगाई का दोष मढ़ना पूरी तरह गलत है। आंकड़ों के मुताबिक, इथेनॉल उत्पादन के लिए डाइवर्ट की जाने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 सीजन के 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 सीजन में महज 9 प्रतिशत रह गई है। इसके अलावा, वर्तमान में भारत के कुल इथेनॉल उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई (75%) हिस्सा गन्ने के बजाय अनाजों, विशेष रूप से मक्के …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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