क्या छात्र राजनीति से शुरू हुआ था मिर्जा फखरुल का सफर? मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने राजनीति में कदम उस दौर में रखा, जब बांग्लादेश आजाद देश नहीं था और उसे पूर्वी पाकिस्तान के तौर पर जाना जाता था। ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान वह वामपंथी विचारधारा वाले ईस्ट पाकिस्तान स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े। 1969 में तत्कालीन सैन्य समर्थित सरकार के खिलाफ हुए जन आंदोलन के दौरान आलमगीर संगठन की ढाका विश्वविद्यालय इकाई के अध्यक्ष बने। यह वह दौर था जब पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक असंतोष तेजी से बढ़ रहा था और आगे चलकर यही घटनाक्रम बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि बना। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान आलमगीर ने वामपंथी विचारों वाले स्वतंत्रता सेनानियों के संगठन और लामबंदी में मदद की। उन्होंने भारत में शरण लेकर भी इस प्रक्रिया में भूमिका निभाई। यानी उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत सीधे किसी बड़े राजनीतिक दल से नहीं हुई थी। वह पहले छात्र आंदोलन और विचारधारा आधारित राजनीति से जुड़े और धीरे-धीरे सक्रिय राजनीतिक जीवन की ओर बढ़े। राजनीति में आने से पहले क्या करते थे मिर्जा फखरुल? राजनीति में पूरी तरह सक्रिय होने से पहले आलमगीर सरकारी सेवा में थे। 1972 में उन्होंने सिविल सेवा के शिक्षा कैडर में प्रवेश किया और अर्थशास्त्र के शिक्षक बने। सरकारी सेवा के दौरान उन्होंने अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाईं। लेकिन 1986 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और सक्रिय राजनीति में उतर गए। इसके दो साल बाद, 1988 में वह अपने गृह क्षेत्र ठाकुरगांव की नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गए। खास बात यह थी कि उन्होंने यह चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीता था। यहीं से उनकी स्थानीय राजनीति में पकड़ मजबूत हुई …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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