पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के भाई मनोहर सिंह ने 2022 में कांग्रेस से टिकट न मिलने पर बस्सी पठाना से निर्दलीय चुनाव लड़ा। कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा और उनके भाई फतेह जंग सिंह बाजवा भी इसका उदाहरण हैं। प्रताप बाजवा कांग्रेस में विपक्ष के नेता बने रहे जबकि फतेह जंग ने भाजपा का दामन थामा।बादल परिवार में भी चचेरे भाइयों के रास्ते अलग हुए। मनप्रीत सिंह बादल ने अकाली दल छोड़कर पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब बनाई, फिर कांग्रेस और बाद में भाजपा में गए। वहीं, सुखबीर सिंह बादल अकाली दल की कमान संभालते रहे। दिवंगत मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते रवनीत सिंह बिट्टू 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए। उनके चचेरे भाई गुरकीरत सिंह कोटली कांग्रेस में ही विधायक और मंत्री बने रहे। बटाला के अश्वनी सेखड़ी और इंदरवीर सिंह सेखड़ी ने 2017 में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा। बाद में दोनों भाजपा में शामिल हुए, पर 2023 में जमीन विवाद में हाथापाई तक हुई। चौधरी और नाभा परिवार में राजनीतिक विभाजन जालंधर के चौधरी परिवार में भी राजनीतिक मतभेद सामने आए। पूर्व सांसद संतोख सिंह चौधरी की पत्नी कर्मजीत कौर चौधरी ने 2024 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा। उनके बेटे विक्रमजीत सिंह चौधरी कांग्रेस में ही बने रहे। टिकट और राजनीतिक उपेक्षा से कर्मजीत कौर की नाराजगी चर्चा में रही। रणदीप सिंह नाभा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री हैं। उनके भाई जसदीप सिंह निक्कू ने आम आदमी पार्टी का रास्ता चुना। मलूका और जाखड़ परिवार की बदलती निष्ठाएं सिकंदर सिंह मलूका शिरोमणि अकाली दल के पुराने नेता और पूर्व मंत्री हैं। उनकी बहू परमपाल कौर सिद्धू, जो पूर्व आईएएस अधिकारी हैं, भाजपा में शामिल हो गईं। उनके बे …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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