कहानी: हवेली के अंदर पूरा बंटवारा 1947 में दंगे भड़क चुके हैं। हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे के बीच सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) अपने परिवार- हमीदा बेगम (प्रीति जिंटा) और जावेद मिर्जा (करण देओल) के साथ लाहौर पहुंचते हैं। नया मुल्क, नया शहर और नए सिरे से जिंदगी शुरू करने की कोशिश। रहने के लिए उन्हें एक बड़ी हवेली मिलती है। लेकिन एक पेंच है। उस घर में दुर्गावती देवी (शबाना आजमी) अभी रहती हैं। उनका परिवार बिछड़ चुका है और वह अपने बेटे रतनलाल के लौटने का इंतजार कर रही हैं। वह घर छोड़ने से साफ मना कर देती हैं। बस, यहीं से असली खेल शुरू होता है। एक तरफ मिर्जा परिवार है, जिसे लाहौर में अपनी जगह बनानी है। दूसरी तरफ दुर्गावती हैं, जिनके लिए वह हवेली सिर्फ चार दीवारें नहीं, उनका पूरा अतीत है। और फिर आता है लोकल नेता याकूब खान (अभिमन्यु सिंह), जिसकी नजर उसी हवेली पर है। मामला सिर्फ घर का नहीं रह जाता। मजहब, राजनीति, नफरत, बदला और इंसानियत… सब एक ही हवेली में घुस आते हैं। हबीब अनवर (अली फजल) भी कहानी में आता है, जो मिर्जा परिवार का साथ देता है और इंसानियत की आवाज बनता है। कहानी का आइडिया अच्छा है। सच कहें तो कागज पर ये फिल्म काफी दमदार लगती है। दिक्कत स्क्रीन पर है। …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
Batwara 1947 Movie Review: सनी देओल कब तक अकेले बचाएंगे? कहानी में दम पर ढाई घंटे तक धैर्य आजमाती है फिल्म
कहानी: हवेली के अंदर पूरा बंटवारा 1947 में दंगे भड़क चुके हैं। हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे के बीच सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) अपने परिवार- हमीदा बेगम (प्रीति जिंटा) और जावेद मिर्जा (करण देओल) के साथ लाहौर पहुंचते हैं। नया मुल्क, नया शहर और नए सिरे से जिंदगी शुरू करने की कोशिश। रहने के लिए उन्हें एक बड़ी हवेली मिलती है। लेकिन एक पेंच है। उस घर में दुर्गावती देवी (शबाना आजमी) अभी रहती हैं। उनका परिवार बिछड़ चुका है और वह अपने बेटे रतनलाल के लौटने का इंतजार कर रही हैं। वह घर छोड़ने से साफ मना कर द