यह तस्वीर नटेरन स्थित संदीपनि विद्यालय की है। रोज सुबह आसपास के गांवों से बच्चे ट्रैक्टर-ट्रॉली में बैठकर स्कूल आते हैं। कोई अपना बस्ता संभालता नजर आता है तो कोई साथी का हाथ पकड़कर सफर करता है। खुले ट्रॉली में धूल, हिचकोले और हादसे का खतरा उनके रोजमर्रा के सफर का हिस्सा बन चुका है।स्थानीय लोगों के अनुसार पहले इन रूटों पर सरकारी बसें चलती थीं, लेकिन अब या तो बसों का संचालन बंद हो गया है या उनकी संख्या इतनी कम है कि सभी बच्चों को सुविधा नहीं मिल पाती। ऐसे में अभिभावकों ने मजबूरी में ट्रैक्टर-ट्रॉली का सहारा लेना शुरू कर दिया। संदीपनि विद्यालय योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना है, ताकि संसाधनों के अभाव में उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो। लेकिन स्कूल तक सुरक्षित पहुंचने की व्यवस्था नहीं होने से योजना के उद्देश्य पर ही सवाल उठ रहे हैं।एक छात्र ने कहा कि हमें पढ़ना है। बस नहीं है तो क्या करें। ट्रॉली से ही जाएंगे, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ेंगे।" बच्चों का यह जज्बा प्रेरणादायक है, लेकिन उनकी मजबूरी व्यवस्था की खामियों को भी उजागर करती है।अभिभावकों का कहना है कि वे बच्चों की पढ़ाई रुकने नहीं देना चाहते, इसलिए मजबूरी में ट्रैक्टर-ट्रॉली से उन्हें स्कूल भेज रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता बच्चों की सुरक्षा है, क्योंकि खुले ट्रॉली में तेज रफ्तार और खराब सड़कों के बीच हादसे का खतरा हमेशा बना रहता है। विदिशा में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी यह पहली तस्वीर नहीं है। कुछ दिन पहले पलोंह गांव का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें बच्चे बस्ता सिर पर रखकर नदी पार कर स्कूल जाते दिखाई दिए थे। अब संदीपनि विद्यालय के बच्चों का ट्रैक्टर-ट …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
देख लो सरकार: पहले अधूरे पुल से उफनती नदी पार की, अब ट्रैक्टर-ट्रॉली से स्कूल; क्या यही है शिक्षा का सफर?
यह तस्वीर नटेरन स्थित संदीपनि विद्यालय की है। रोज सुबह आसपास के गांवों से बच्चे ट्रैक्टर-ट्रॉली में बैठकर स्कूल आते हैं। कोई अपना बस्ता संभालता नजर आता है तो कोई साथी का हाथ पकड़कर सफर करता है। खुले ट्रॉली में धूल, हिचकोले और हादसे का खतरा उनके रोजमर्रा के सफर का हिस्सा बन चुका है।स्थानीय लोगों के अनुसार पहले इन रूटों पर सरकारी बसें चलती थीं, लेकिन अब या तो बसों का संचालन बंद हो गया है या उनकी संख्या इतनी कम है कि सभी बच्चों को सुविधा नहीं मिल पाती। ऐसे में अभिभावकों ने मजबूरी में ट्रैक्टर-ट्रॉल