भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल: आखिर क्यों गूंजा था ‘करो या मरो’, कैसे बदल गई आजादी की लड़ाई की दिशा? इसी ऐतिहासिक बैठक में गांधीजी ने वह संदेश दिया, जिसने पूरे देश में नई ऊर्जा भर दी करो या मरो । यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ अंतिम जनसंघर्ष का आह्वान था। उसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया और ब्रिटिश सरकार से साफ शब्दों में कहा कि अब भारत पर उसका शासन समाप्त होना चाहिए। इसके साथ ही शुरू हुआ भारत छोड़ो आंदोलन, जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे व्यापक और निर्णायक जनआंदोलनों में से एक माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत क्यों हुई और इसने भारत की आजादी की लड़ाई की दिशा कैसे बदल दी? आइए जानते हैं… 8 अगस्त 1942, मुंबई का ग्वालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) लोगों से खचाखच भरा हुआ था। मंच पर महात्मा गांधी मौजूद थे। देश के सामने सबसे बड़ा सवाल था क्या भारत अंग्रेजों के अधीन रहते हुए द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन का साथ देता रहेगा या अब अपनी आजादी के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ेगा? आखिर 1942 में ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस ने अंतिम लड़ाई का फैसला किया? भारत छोड़ो आंदोलन अचानक शुरू नहीं हुआ था। इसके पीछे कई वर्षों की राजनीतिक घटनाएं और उस समय की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां थीं। सितंबर 193 …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल: आखिर क्यों गूंजा था 'करो या मरो', कैसे बदल गई आजादी की लड़ाई की दिशा?
भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल: आखिर क्यों गूंजा था 'करो या मरो', कैसे बदल गई आजादी की लड़ाई की दिशा? इसी ऐतिहासिक बैठक में गांधीजी ने वह संदेश दिया, जिसने पूरे देश में नई ऊर्जा भर दी करो या मरो । यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ अंतिम जनसंघर्ष का आह्वान था। उसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया और ब्रिटिश सरकार से साफ शब्दों में कहा कि अब भारत पर उसका शासन समाप्त होना चाहिए। इसके साथ ही शुरू हुआ भारत छोड़ो आंदोलन, जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के