वित्त विभाग की अधिसूचना के अनुसार, सरकार 13 वर्ष की अवधि वाली सरकारी प्रतिभूतियां (गवर्नमेंट सिक्योरिटीज) जारी करेगी। इन प्रतिभूतियों की बिक्री भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के माध्यम से ई-नीलामी प्रक्रिया के जरिए संपन्न होगी। इस नीलामी में बैंक, बीमा कंपनियां, वित्तीय संस्थान और अन्य अधिकृत निवेशक भाग ले सकेंगे। नीलामी से प्राप्त धनराशि सीधे राज्य सरकार के खाते में आएगी, जिसका उपयोग बजट में स्वीकृत योजनाओं और पूंजीगत विकास कार्यों के लिए किया जाएगा।प्रदेश सरकार वित्तीय वर्ष के दौरान चरणबद्ध तरीके से बाजार से ऋण जुटाती है। यह प्रक्रिया राज्यों को केंद्र सरकार और आरबीआई द्वारा निर्धारित उधार सीमा के भीतर वित्तीय संसाधन प्राप्त करने की अनुमति देती है। राज्य सरकार का मानना है कि विकास कार्यों की निरंतरता बनाए रखने और पूंजीगत निवेश को बढ़ाने के लिए समय-समय पर बाजार से ऋण लेना आवश्यक है। बढ़ता कर्ज और वित्तीय चुनौतियां हालांकि, इस नई उधारी के साथ हिमाचल प्रदेश पर कुल कर्ज का बोझ भी बढ़ने की आशंका है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक हिमाचल प्रदेश की कुल देनदारियां और बकाया ऋण 1.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुके हैं। इस आंकड़े में बाजार से लिए गए ऋण, केंद्र सरकार से प्राप्त कर्ज, सार्वजनिक खाते की देनदारियां और अन्य वित्तीय दायित्व शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी राज्यों में सीमित संसाधनों और अधिक विकास लागत के कारण उधारी पर निर्भरता अपेक्षाकृत अधिक रहती है। वित्तीय जानकारों के अनुसार, यदि ऋण की राशि का उपयोग सड़क, पुल, सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य उत्पादक परिसंपत्तियों के निर्माण में किया जाए, तो यह भविष्य में …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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