फिर कोलकाता क्यों छोड़ना पड़ा? तसलीमा नसरीन की मुश्किलें उनकी आत्मकथा के प्रकाशन के साथ लगातार बढ़ती गईं। 1998 में उनकी आत्मकथा का पहला भाग ‘मेयेबेला’ (My Bengali Girlhood) प्रकाशित हुआ। लेकिन बड़ा विवाद 2003 में आत्मकथा के दूसरे भाग ‘द्विखंडितो’ (Dwikhondito) के प्रकाशन के बाद शुरू हुआ। इस पुस्तक के कुछ अंशों को धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताया गया। 18 नवंबर 2003 को कवि सैयद हसमत जलाल द्वारा दायर मानहानि याचिका पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने पुस्तक के प्रकाशन पर अंतरिम रोक लगाने की अनुमति दी। इसके दस दिन बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा (सीपीएम) सरकार ने यह कहते हुए पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया कि इससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। हालांकि, प्रकाशक ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी। सितंबर 2005 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्रतिबंध को रद्द करते हुए कहा कि पुस्तक का उद्देश्य किसी धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था और सरकार का प्रतिबंध उचित नहीं है। इसी दौरान 2004 में केंद्र सरकार से अस्थायी रेजिडेंस परमिट मिलने के बाद तसलीमा कोलकाता आ गईं। वह यहां रहने लगीं और बंगाली अखबारों में नियमित रूप से लेख लिखने लगीं। लेकिन ‘द्विखंडितो’ को लेकर विवाद और विरोध खत्म नहीं हुआ। जून 2006 में कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के तत्कालीन इमाम सैयद नूर-उर-रहमान बरकती ने तसलीमा का चेहरा काला करने वाले को इनाम देने की घोषणा कर दी। कई संगठनों ने उन्हें भारत से बाहर भेजने की मांग भी उठाई। इसके बाद अगस्त 2007 में हैदराबाद में उनके उपन्यास ‘शोध’ के तेलुगु अनुवाद के कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर एआईएमआईएम से जुड़े लोगों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की। हाल …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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