एतिहासिक और विवादित भोजशाला मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया अंतरिम आदेश के बाद धार में एक बार फिर माहौल गरमा गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रशासन को भोजशाला के समीप खुले स्थान पर नमाज की व्यवस्था करने के निर्देश दिए जाने के बाद हिंदू पक्ष ने इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया है। इस संबंध में हिंदू पक्ष के प्रतिनिधियों ने कलेक्टर से मुलाकात कर उन्हें एक ज्ञापन सौंपा। हिंदू पक्ष के प्रतिनिधि गोपाल शर्मा ने ज्ञापन सौंपने के बाद मीडिया से चर्चा में कहा कि माननीय हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही अपने आदेशों में स्पष्ट किया है कि भोजशाला मां सरस्वती का मंदिर है। कोर्ट के रुख से साफ है कि भोजशाला में नमाज़ की अनुमति नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला परिसर के ‘निकट’ खुले स्थान पर नमाज़ की व्यवस्था करने की बात कही है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के नियमों के अनुसार, भोजशाला का 100 मीटर का क्षेत्र संरक्षित और 200 से 300 मीटर का क्षेत्र आरक्षित है। ऐसे में कुल 300 मीटर के इस पूरे परिसर के बाहर ही नमाज़ की व्यवस्था की जानी चाहिए। कब्रिस्तान में नमाज़ नहीं, फातिहा पढ़ी जाती है ज्ञापन में धार्मिक मान्यताओं और नियमों का हवाला देते हुए हिंदू पक्ष ने कहा कि प्रशासन जिस नजदीकी स्थान पर नमाज़ कराने की सोच रहा है, वह वास्तव में कब्रों से घिरा हुआ है। कुरान और इस्लामिक नियमों के अनुसार भी कब्रिस्तान या कब्रों वाली जगह पर नमाज़ नहीं पढ़ी जाती, वहां केवल फातिहा पढ़ी जाती है। ऐसे में वहां नमाज़ करवाना धार्मिक दृष्टिकोण से भी उचित नहीं है। हिंदू पक्ष ने इतिहास का हवाला देते हुए दावा किया कि वर्ष 1935 में भोजशाला के पास जो नमाज़ शुरू हुई …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
भोजशाला मामले में नया मोड़: हिंदू पक्ष ने जताया विरोध, सौंपा ज्ञापन; कहा- 300 मीटर दायरे के बाहर हो नमाज
एतिहासिक और विवादित भोजशाला मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया अंतरिम आदेश के बाद धार में एक बार फिर माहौल गरमा गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रशासन को भोजशाला के समीप खुले स्थान पर नमाज की व्यवस्था करने के निर्देश दिए जाने के बाद हिंदू पक्ष ने इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया है। इस संबंध में हिंदू पक्ष के प्रतिनिधियों ने कलेक्टर से मुलाकात कर उन्हें एक ज्ञापन सौंपा। हिंदू पक्ष के प्रतिनिधि गोपाल शर्मा ने ज्ञापन सौंपने के बाद मीडिया से चर्चा में कहा कि माननीय हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही अ