एक्टिंग फिल्म की कास्ट को देखकर लगता है कि मेकर्स को अपनी स्टारकास्ट पर स्क्रिप्ट से ज्यादा भरोसा था…और अगर फिल्म कहीं टिकती है, तो उसकी वजह सिर्फ स्टारकास्ट है। अजय देवगन अपनी सिग्नेचर स्टाइल में सहज लगते हैं, जबकि अरशद वारसी और जावेद जाफरी कई फीके पलों को अपनी कॉमिक टाइमिंग से संभाल लेते हैं। रितेश देशमुख मस्ती वाले अंदाज में ठीक लगते हैं और संजय मिश्रा व रवि किशन अपने सीमित स्क्रीन टाइम में भी ध्यान खींच लेते हैं। अंजलि आनंद अच्छी स्क्रीन प्रेजेंस छोड़ती हैं…सबसे हैरानी की बात यह है कि बॉडी शेमिंग के खिलाफ खुलकर बोलने वाली अंजलि के किरदार पर भी फिल्म में बार-बार उसी तरह के मजाक किए जाते हैं। कमी अंजलि के अभिनय में नहीं, बल्कि स्क्रिप्ट में है, जो आज भी ऐसे पुराने और आसान चुटकुलों का सहारा लेती है। वहीं संजीदा शेख को जितना मौका मिलता है, उसमें वह अपना काम ठीक से निभाती हैं। बस ईशा गुप्ता के हिस्से करने को इतना कम आता है, मानो उन्हें स्क्रिप्ट नहीं, सिर्फ कॉल टाइम भेजा गया हो। कुल मिलाकर, स्टारकास्ट पूरी ईमानदारी से फिल्म को संभालने की कोशिश करती है, लेकिन जब स्क्रिप्ट बार-बार साथ छोड़ दे, तो सिर्फ अच्छी परफॉर्मेंस के दम पर पूरी फिल्म को बचाना आसान नहीं होता। …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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