1 of 8 डायना पुंडोले - फोटो : instagram खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें यह खबर एप पर पढ़ें या वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो देखें संक्षिप्त देखें लोड हो रहा है अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो लॉगिन करें Link Copied एक तरफ सुरक्षित नौकरी थी, दूसरी तरफ रफ्तार से भरी अनिश्चित दुनिया। एक तरफ क्लासरूम में बच्चों को पढ़ाने का सपना था, तो दूसरी तरफ रेसिंग ट्रैक पर खुद को साबित करने की चुनौती। ज्यादातर लोग शायद सुरक्षित रास्ता चुनते, लेकिन डायना पुंडोले ने वह रास्ता चुना, जिस पर न मंजिल तय थी और न ही सफलता की गारंटी। आज वही डायना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फेरारी चलाने वाली पहली भारतीय महिला बन चुकी हैं, लेकिन इस उपलब्धि तक पहुंचने का सफर जितना चमकदार दिखता है, उतना आसान कभी नहीं था। आइए उनकी कहानी जानते हैं… View this post on Instagram A post shared by Diana (@diana.pundole) 2 of 8 डायना पुंडोले - फोटो : instagram पिता का सपना, जिसने बदल दी जिंदगी पुणे में पली-बढ़ीं डायना के भीतर रेसिंग का जुनून बचपन से था। उनके पिता फॉर्मूला-1 के बड़े प्रशंसक थे और शायद ही कोई रेस मिस करते हों। सात साल की उम्र में डायना ने पहली बार गो-कार्टिंग की और वहीं से स्पीड के प्रति उनका लगाव शुरू हुआ। 3 of 8 डायना पुंडोले - फोटो : instagram View this post on Instagram A post shared by Diana (@diana.pundole) समय बीतने के साथ उनके पिता इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनका सपना डायना की सबसे बड़ी ताकत बन गया। वह कई बार कह चुकी हैं कि आज भी हर रेस में उन्हें अपने पिता का साथ महसूस होता है। मुश्किल समय में वही यादें उन्हें आगे बढ़ने …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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