अगर यह राजनीतिक उलटफेर हकीकत में बदलता है, तो इसका सबसे बड़ा असर आगामी मानसून सत्र पर पड़ेगा। केंद्र सरकार के लिए उस परिसीमन बिल को पास कराने की राह आसान हो जाएगी, जो हाल ही में संसद के भीतर संख्या बल के चक्रव्यूह में फंसकर गिर गया था। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि पिछली बार संसद में इस बिल को लेकर क्या हंगामा हुआ था, विपक्षी दलों को क्या आपत्ति थी, पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने इस पर क्या स्टैंड लिया था और अब नए समीकरणों से आंकड़े कैसे बदलेंगे?सरकार जब लोकसभा में परिसीमन बिल, 2026 और उससे जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक लेकर आई थी, तो सदन में भारी गतिरोध पैदा हो गया था। विपक्ष ने इस बिल को एकतरफा और संघीय ढांचे के खिलाफ बताया था। विपक्षी सांसदों ने सदन के वेल में आकर नारेबाजी की थी। विपक्ष का मुख्य आरोप था कि सरकार बिना व्यापक सहमति के देश का राजनीतिक नक्शा बदलना चाहती है। संख्या बल के मामले में विपक्ष उस समय पूरी तरह एकजुट था। नतीजा यह हुआ कि सरकार विशेष बहुमत के लिए जरूरी आंकड़े नहीं जुटा पाई और यह महत्वपूर्ण बिल लोकसभा में गिर गया। इसे सरकार के लिए एक बड़े राजनीतिक झटके के रूप में देखा गया था।परिसीमन का मतलब होता है देश में आबादी के हिसाब से लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं को दोबारा तय करना और सीटों की संख्या को बढ़ाना। इस प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों, खासकर दक्षिण भारत के राज्यों की तीन बड़ी आपत्तियां थीं।डीएमके के नेता एमके स्टालिन और अन्य दक्षिण भारतीय नेताओं का सबसे बड़ा विरोध यह था कि उनके राज्यों ने पिछले पांच दशकों में जनसंख्या नियंत्रण पर बहुत शानदार काम किया है। इसके विपरीत, उत्तर भारत के राज्यों, जैसे उत्तर …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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