इंदौर में 1930 के करीब महारानी रोड पर साइकिल की दुकानें खुलना आरंभ हुईं और धीरे-धीरे यह साइकिल बिक्री का प्रमुख केंद्र बन गया। 1950 से 60 के मध्य इंदौर में 10 रुपये में साइकिल मिल जाया करती थी, वह भी किस्तों में। साइकिल की बिक्री पर विशेष छूट दुकानदारों द्वारा दी जाती थी।दहेज या उपहार में साइकिल देने का प्रचलन 1950 के दशक में शुरू हुआ। क्लर्क कॉलोनी निवासी 96 वर्षीय अन्नाजी बताते हैं कि साइकिल के बारे में सुना तो बड़ा आश्चर्य हुआ। मैं मेरे पिताजी के साथ पहली बार साइकिल देखने गया था। बड़े ही कौतुहल के साथ साइकिल को हमने निहारा था। साइकिल चलाने का लाइसेंस लगता था और साइकिल पर वार्षिक कर भी वसूला जाता था। घरेलू और व्यावसायिक उपयोग की दरें अलग-अलग थीं।1958 के स्थानीय नगर निगम के चुनाव में साइकिल पर लगने वाले कर की समाप्ति का वादा विपक्षी पार्टी द्वारा किया गया और इसी मुद्दे पर वह चुनाव में विजयी हुई। 1957-58 में नगर में साइकिल कर से निगम को 51,284 रुपये प्राप्त हुए थे। इंदौर की कपड़ा मिलों के अधिकतर मजदूरों के पास साइकिल थी। साइकिल पर लगने वाले कर और समय-समय निगम की साइकिल कर की जांच से वे परेशान थे।साइकिल एक परिवहन का सस्ता और सुगम साधन था। साइकिल दुकानों से प्रति घंटे की दर से किराए पर भी दी जाती थी। वर्तमान में एआईसीटीएल द्वारा आधुनिक साइकिलें केंद्रों पर किराये में उपलब्ध हैं। पहले दूध की आपूर्ति करने करने वाले सर्वाधिक साइकिल का उपयोग करते थे, पर समय के साथ अब वे भी बाइक से दूध देने आते हैं। इसकी मुख्य वजह शहर का विस्तार और दूरियों का बढ़ना प्रमुख है। साइकिल मुख्यत: पर्यावरण हितैषी वाहन है। जब देश में ईंधन संकट होता है तो साइकिल पर …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

मूल लेख स्रोत पर पढ़ें