पश्चिम बंगाल में मिली करारी हार को पचा पाना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बेहद मुश्किल हो रहा है। यही वजह है कि उन्होंने नतीजों के एक दिन बाद अपने चिरपरिचित अंदाज में इस्तीफा देने तक से इन्कार कर दिया। हठधर्मी रहीं ममता के लिए ऐसा करना स्वाभाविक भी है। आखिरकार, उन्हें पूरा भरोसा था कि एसआईआर के मुद्दे पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को घेरना उन्हें चुनावी लाभ पहुंचाएगा, लेकिन नतीजों ने उन्हें हैरान कर दिया। उनकी तमाम कोशिशें सत्ता विरोधी लहर से उबारने में काम नहीं आईं। चुनावों के दौरान ममता बनर्जी ने इस पर जमकर आवाज उठाई कि बंगाल में एसआईआर के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। उन्होंने आयोग पर केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया। सुप्रीम कोर्ट में जनता की याचिकाकर्ता के तौर पर दलीलें पेश करके यह साबित किया कि चाहे कोलकाता की गली हो या दिल्ली का न्यायालय, उन्होंने अंत तक लड़ने की अपनी प्रवृत्ति नहीं खोई थी। लेकिन नतीजे दर्शाते है कि एसआईआर तृणमूल के लिए सत्ता विरोधी लहर को बेअसर करने का हथियार साबित नहीं हुआ।ममता शिक्षक भर्ती घोटाले से लेकर पार्टी सहयोगियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों तक कई मोर्चों पर घिरी थीं। कानून-व्यवस्था के साथ महिला सुरक्षा का मुद्दा बड़ा था और यही तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के कारण भी बने। 2021 में भी ममता को मोदी-नीत भगवा पार्टी से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था, लेकिन तब वह कल्याणकारी योजनाओं और बंगाली संस्कृति को बाहरी लोगों से बचाने की अपील के दम पर जीत हासिल करने में सफल रहीं।इस बार उन्होंने युवा साथी योजना (21 से 40 वर्ष की आयु के बेरोजगार दसवीं पास छात्रों के लि …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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