कोलकाता चुप रहने वाला शहर रहा है। यहां वोट मन में पड़ता है और जुबान पर नहीं आता। पर, इस बार कुछ बदला है। ड्राइंग रूम की बहस सड़कों पर आ गई है। टैक्सी ड्राइवर से लेकर न्यू टाउन के फ्लैट्स तक लोग कम से कम इस बार बोल रहे हैं। संकोच के साथ या खुलकर कह रहे हैं कि इस बार मुकाबला बराबरी का है। यह हिचक का टूटना ही इस चुनाव की असली पटकथा है।सिटी ऑफ जॉय की 11 सीटें इस बार सत्ता की प्लेइंग इलेवन हैं। चुनाव आयोग की मतदाता सूची की सफाई यानी एसआईआर ने यहा एक डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक की है। चौरंगी और जोड़ासांको जैसे इलाकों से भूतिया वोटरों की विदाई हो चुकी है। अब जीत छप्पा वोट से नहीं, बल्कि असली नागरिक के विवेक से तय होगी। भाजपा के प्रबंधन और तृणमूल की जमीनी पकड़ के बीच यह असली पावरप्ले है।बंगाल का भद्रलोक हमेशा से अतिवाद से बचता रहा है। जिस समाज ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम और राष्ट्रगान जन-गण-मन जैसी अभिव्यक्ति दी, उसके भीतर आज अजीब कसमसाहट है। भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति को कांग्रेस और वामपंथी सोच वाला वर्ग अब तक सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहा था। हालांकि, अब तृणमूल से भी उनका मन उचाट दिख रहा है। बंगाली पहचान और गौरव को हमेशा तवज्जो देने वाले इस समाज के सामने सुरक्षा, भ्रष्टाचार और अस्मिता की नई चुनौतियां हैं। कोलकाता का यह संभ्रांत वर्ग चुप नहीं है। चौक-चौराहों की बहसों में मुखर है।ममता ने कभी मां, माटी, मानुष के त्रिशूल से वामपंथ का किला ढहाया था, आज फिर थ्री एम इस चुनाव की केंद्रीय विषयवस्तु है। एम के नए तीन तीर हैं…ममता, महिला व मुसलमान। लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं ने ग्रामीण महिलाओं की ऐसा मौन वोटर तैयार किया है, जो वफादारी का वचन देता है। हरियाणा, महाराष्ट्र, झार …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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