बंगाल में कई दशकों से मत प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से ज्यादा रहा है, पर कोलकाता उदासीन रहा है। राज्य में मतदान प्रतिशत 80 से ऊपर जाता रहा है, वहीं कोलकाता में 60-65% से ज्यादा मतदान कभी नहीं हुआ। दूसरे चरण में जिन सीटों पर चुनाव है, उनमें कोलकाता की भी 11 सीटें हैं। इन सीटों पर एसआईआर के बाद होने वाले चुनाव का अंकगणित सियासत की भौतिकी और समाज के रसयान को उलट-पलट कर रहा है।इस नए अंकगणित की गहराई में उतरेंगे, तो पता चलेगा कि अगर एक भी नया मतदाता घर से न निकले और सिर्फ लोकसभा चुनाव 2024 के बराबर ही वोट पड़े, तो भी मतदान 93% की आसमानी ऊंचाइयों को छू लेगा। यह कोरा कागजी तिलिस्म है या कोई गहरा राजनीतिक संदेश? इन भंवर की परतों को उधेड़ने पर सच कुछ इस तरह से सामने आया।इस नए अंकगणित को समझने के लिए चौरंगी विधानसभा क्षेत्र सबसे सटीक उदाहरण है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 2,09,713 पंजीकृत मतदाता थे। मतदान का प्रतिशत 55.40 रहा था। अब चुनाव आयोग की हालिया प्रशासनिक सफाई के बाद यहां 83,364 मतदाता (लगभग 40%) सूची से बाहर हो गए और मतदाताओं की संख्या घटकर मात्र 1,26,349 रह गई है। अब गणित का असली जादू देखिए। यदि 2026 में भी उतने ही वोट पड़े, जितने कि 2024 में पड़े थे तो कम हुए आधार के कारण मतदान का प्रतिशत स्वतः ही बढ़कर 91.96% हो जाएगा। यह उछाल किसी जन-उभार का परिणाम नहीं, बल्कि सूची से भूतिया और फर्जी मतदाताओं की विदाई का परिणाम है।आंकड़ों की इस मृगतृष्णा ने बंगाल की राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा कर दिया है। यह सिर्फ प्रतिशत का उछाल नहीं है, बल्कि उन अदृश्य वोटों की कहानी है, जिन्हें यहां हार-जीत का मुख्य किरदार माना जाता है।तृणमूल इसे महज एक पाटीगणित (अंकगणित) बताकर खारिज …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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