आज का शब्द: अहरह और सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘दिवा स्वप्न’ हिंदी हैं हम शब्द-शृंखला में आज का शब्द है - अहरह जिसका अर्थ है 1. बिना रुके 2. हर समय। कवि सुमित्रानंदन पंत ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है। दिन की इस विस्तृत आभा में, खुली नाव पर, आर पार के दृश्य लग रहे साधारणतर। केवल नील फलक सा नभ, सैकत रजतोज्वल, और तरल विल्लौर वेश्मतल सा गंगा जल- चपल पवन के पदाचार से अहरह स्पंदित- शांत हास्य से अंतर को करते आह्लादित। मुक्त स्निग्ध उल्लास उमड़ जल हिलकोरों पर नृत्य कर रहा, टकरा पुलकित तट छोरों पर। यह सैकत तट पिघल पिघल यदि बन जाता जल बह सकती यदि धरा चूमती हुई दिगंचल, यदि न डुबाता जल, रह कर चिर मृदुल तरलतर, तो मैं नाव छोड़, गंगा के गलित स्फटिक पर आज लोटता, ज्योति जड़ित लहरों संग जी भर! किरणों से खेलता मिचौनी मैं लुक छिप कर, लहरों के अंचल में फेन पिरोता सुंदर, हँसता कल कल: मत्त नाचता, झूल पैंग भर! कैसा सुंदर होता, वदन न होता गीला, लिपटा रहता सलिल रेशमी पट सा ढीला! यह जल गीला नहीं, गलित नभ केवल चंचल, गीला लगता हमें, न भीगा हुआ स्वयं जल। हाँ, चित्रित-से लगते तृण-तरु भू पर बिम्बित, मेरे चल पद चूम धरणि हो उठती कंपित। एक सूर्य होता नभ में, सौ भू पर विजड़ित, सिहर सिहर क्षिति मारुत को करती आलिंगित। निशि में ताराओं से होती धरा जब खचित स्वप्न देखता स्वर्ग लोक में मैं ज्योत्स्ना स्मित! गुन के बल चल रही प्रतनु नौका चढ़ाव पर, बदल रहे तट दृश्य चित्रपट पर ज्यों सुंदर। वह, जल से सट कर उड़ते है चटुल पनेवा, इन पंखो की परियों को चाहिए न खेवा! दमक रही उजियारी छाती, करछौंहे पर, श्याम घनों से झलक रही बिजली क्षण क्षण पर! उधर कगारे पर अटका है पीपल तरुव …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
आज का शब्द: अहरह और सुमित्रानंदन पंत की कविता 'दिवा स्वप्न'
आज का शब्द: अहरह और सुमित्रानंदन पंत की कविता 'दिवा स्वप्न' हिंदी हैं हम शब्द-शृंखला में आज का शब्द है - अहरह जिसका अर्थ है 1. बिना रुके 2. हर समय। कवि सुमित्रानंदन पंत ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है। दिन की इस विस्तृत आभा में, खुली नाव पर, आर पार के दृश्य लग रहे साधारणतर। केवल नील फलक सा नभ, सैकत रजतोज्वल, और तरल विल्लौर वेश्मतल सा गंगा जल- चपल पवन के पदाचार से अहरह स्पंदित- शांत हास्य से अंतर को करते आह्लादित। मुक्त स्निग्ध उल्लास उमड़ जल हिलकोरों पर नृत्य कर रहा, टकरा पुलकित तट छ