सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक के बाद एक कई पोस्ट करते हुए गालिबाफ ने कड़े तेवर दिखाए। उन्होंने कहा कि ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने बातचीत के दौरान कई भविष्योन्मुखी और सकारात्मक पहल पेश की थीं, लेकिन अमेरिकी पक्ष ईरान का भरोसा जीतने में पूरी तरह नाकाम रहा। गालिबाफ ने कहा कि अब गेंद अमेरिका के पाले में है और उसे ही तय करना है कि वह ईरान का विश्वास हासिल करना चाहता है या नहीं।ईरानी नेता ने बातचीत शुरू होने से पहले ही अपनी मंशा साफ कर दी थी। उन्होंने कहा था कि ईरान नेक नीयती और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ मेज पर आया है, लेकिन पिछले दो युद्धों के कड़वे अनुभवों ने ईरान के मन में अमेरिका के प्रति गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है। गालिबाफ के अनुसार, अमेरिका की कथनी और करनी में अंतर ही इस विफलता की मुख्य वजह बना।हालांकि गालिबाफ ने अपनी पोस्ट में बहुत ज्यादा विस्तार से जानकारी नहीं दी, लेकिन ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार बातचीत टूटने के पीछे दो सबसे बड़े कारण रहे। पहला, ईरान के परमाणु कार्यक्रम की सीमाओं और निगरानी को लेकर दोनों देशों के बीच गहरी खाई बनी हुई है। इसके अलावा, सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज के रास्ते से होने वाले पारगमन को लेकर भी दोनों पक्षों में सहमति नहीं बन सकी।जानकारों का मानना है कि 1979 की क्रांति के बाद पहली बार दोनों देशों के बीच इस स्तर की सीधी बातचीत हो रही थी, जिससे दुनिया को बड़ी उम्मीदें थीं। अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था। अमेरिकी पक्ष ने अपने प्रस्ताव को अंतिम और सर्वश्रेष्ठ करार दिया था, लेकिन ईरान ने इसे अपर्याप्त माना।फिलहाल, इस्लामाबाद वार्ता के विफल होने से मध्य पूर्व में तनाव कम होने …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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