पाकिस्तान की सरकार और सेना के लिए यह मध्यस्थता केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं थी। देश की अर्थव्यवस्था, तेल की जरूरतें, रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांप्रदायिक सद्भाव इस युद्ध के रुकने पर निर्भर थे। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों की वजह से शहबाज शरीफ सरकार दबाव में थी। पाकिस्तान में जबर्दस्त विरोध हो रहा था। लोग सड़कों पर उतर आए थे। शरीफ सरकार को पेट्रोल की कीमत 80 रुपये प्रति लीटर तक घटानी पड़ी। इसके बावजूद पेट्रोल 378 रुपये प्रति लीटर में बिक रहा था।पाकिस्तान की ईरान के साथ 900 किलोमीटर लंबी अस्थिर सीमा है, जहां दोनों ओर बलूच आबादी के गहरे संबंध हैं। पाकिस्तान में शिया समुदाय करीब 15% आबादी का हिस्सा है और ईरान के बाद यहां उनकी सबसे बड़ी संख्या है। इसलिए आंतरिक दबाव भी था कि मामले को सुलझाया जाए। ऐसा न होने पर पाकिस्तान में अंदरूनी हालात बिगड़ सकते थे। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर रावलपिंडी में एक इफ्तार कार्यक्रम के दौरान शिया धर्मगुरुओं को धमकी दे चुके थे। उन्होंने धमकी भरे अंदाज में कहा किथ था अगर आपको ईरान इतना पसंद है, तो आप वहां चले जाएं। …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
खुद जंग में उतरने का डर, तेल-गैस की कमी और...: किस डर से अमेरिका-ईरान का संदेशवाहक बनने पर मजबूर हुआ पाकिस्तान
पाकिस्तान की सरकार और सेना के लिए यह मध्यस्थता केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं थी। देश की अर्थव्यवस्था, तेल की जरूरतें, रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांप्रदायिक सद्भाव इस युद्ध के रुकने पर निर्भर थे। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों की वजह से शहबाज शरीफ सरकार दबाव में थी। पाकिस्तान में जबर्दस्त विरोध हो रहा था। लोग सड़कों पर उतर आए थे। शरीफ सरकार को पेट्रोल की कीमत 80 रुपये प्रति लीटर तक घटानी पड़ी। इसके बावजूद पेट्रोल 378 रुपये प्रति लीटर में बिक रहा था।पाकिस्तान की ईरान के साथ 900 किलोमीटर लंबी अस्थिर