‘दो पार्ट बनाना कोई ट्रेंड नहीं’ ‘जब मैंने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की कहानी अनुराग कश्यप को पहली बार पिच की थी, तब मैंने ही उन्हें इसे दो पार्ट में सुनाया था। उस समय यह साफ नहीं था कि फिल्म एक ही होगी या दो हिस्सों में बनेगी। लेकिन जब अनुराग सर ने कहा कि इस पर ठीक से रिसर्च करो और विस्तार से लिखो, तब असली कहानी खुलनी शुरू हुई। रिसर्च और राइटिंग के दौरान हमें महसूस हुआ कि यह सिर्फ एक गैंगस्टर या गैंगवॉर स्टोरी नहीं बल्कि कई पीढ़ियों में फैली एक लंबी गाथा है। इसमें समय के साथ बदलते रिश्ते हैं। सत्ता की लड़ाई है। कई घटनाएं हैं जो मिलकर एक बड़ी दुनिया बनाते हैं। जैसे जैसे हम इस पर काम करते गए, कहानी फैलती चली गई। धीरे धीरे स्क्रिप्ट इतनी बड़ी हो गई कि वह लगभग 700 पन्नों तक पहुंच गई। अगर उस पूरी स्क्रिप्ट को ज्यों का त्यों फिल्माया जाता, तो फिल्म की लंबाई करीब नौ या साढ़े नौ घंटे तक पहुंच सकती थी। जाहिर है थिएटर में इतनी लंबी फिल्म दिखाना संभव नहीं था। ऐसे में हमने बाद में काफी एडिटिंग और री स्ट्रक्चरिंग की। आखिरकार इसे लगभग साढ़े पांच घंटे की फिल्म में ढाला गया। फिर इसे दो हिस्सों में रिलीज किया गया। असल बात यह है कि दो पार्ट बनाना कोई ट्रेंड नहीं है। अगर फिल्ममेकर का विजन साफ हो और कहानी इतनी बड़ी हो कि उसे दो हिस्सों में बताना जरूरी हो, तभी उसे दो भागों में बनाया जाता है। यह पूरी तरह कहानी पर निर्भर करता है।’ जीशान कादरी, लेखकर-अभिनेता …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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