कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने एक्स पोस्ट में कहा ‘केरल में चल रहे विधानसभा चुनाव की वजह से मैं संसद को मिस करूंगा, फिर भी मैं वहां हो रहे विधायी घटनाक्रमों की रिपोर्ट पर नजर रख रहा हूं। लोकसभा में पेश किए गए ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026’ को लेकर मैं बहुत चिंतित हूं। इसे काफी गुपचुप तरीके से और संबंधित पक्षों से बिना उचित सलाह-मशविरे के पेश किया गया। यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक एनएएलएसए (2014) फैसले के बाद स्थापित अधिकार-आधारित ढांचे में एक बुनियादी उलटफेर जैसा लगता है।‘उन्होंने कहा कि इन संशोधनों से 2019 के अधिनियम की धारा 4(2) को हटा दिया गया है, जो अपनी खुद की समझ के आधार पर अपनी लैंगिक पहचान तय करने के अधिकार की गारंटी देती थी। इसकी जगह अब एक ऐसी व्यवस्था लाई गई है जिसमें पहचान को मान्यता मिलने से पहले मेडिकल बोर्ड से सत्यापन और सरकारी अधिकारियों से प्रमाण पत्र लेना जरूरी होगा। असल में अब सरकार यह तय करेगी कि कोई नागरिक खुद को क्या समझता है— यह एक ऐसा दखल है जो गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक वादे के साथ मेल नहीं खाता।शशि थरूर ने आगे कहा कि उतना ही चिंताजनक ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति’ की परिभाषा को बहुत ज्यादा सीमित कर देना भी है। इससे इस बात का खतरा है कि ट्रांस-पुरुष, ट्रांस-महिलाएं, नॉन-बाइनरी और लैंगिक रूप से विविध वे लोग, जिन्हें पहले कानून के तहत मान्यता मिली हुई थी, अब इस दायरे से बाहर हो सकते हैं। साथ ही, यह लैंगिक पहचान को केवल जैविक लक्षणों या कुछ चुनिंदा सामाजिक-सांस्कृतिक श्रेणियों तक ही सीमित कर देता है। यह विधेयक लैंगिक-पुष्टि सर्जरी की जानकारी अधिकारियों को देना अनिवार्य बनाता है। इससे निजता को …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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