बंगाल में विधानसभा की कुल सीटें 294 हैं। 2021 में तृणमूल ने 213 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा को 77 सीटें मिली थीं। चार सीटें निर्दलीयों के खाते में गई थीं। यह महज एक समग्र आंकड़ा नहीं है। इसकी असली ताकत तब समझ आती है, जब भौगोलिक क्षेत्रों में बांटकर देखते हैं। 2026 का चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक मॉडल वेलफेयर और क्षेत्रीय पहचान बनाम विकास और राष्ट्रीय राजनीति के बीच सीधी टक्कर है। जिसने क्षेत्रीय गणित साध लिया, वही बंगाल की सत्ता पर काबिज होगा।एक ओर तृणमूल कांग्रेस है, जो अपनी कल्याणकारी योजनाओं व बंगाली अस्मिता के मुद्दे को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ रही है। पार्टी महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता, मुफ्त राशन, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं के सहारे सीधे मतदाताओं तक पहुंच बनाने में जुटी है। साथ ही बाहरी बनाम स्थानीय की बहस को भी धार दे रही है।वहीं, दूसरी ओर भाजपा विकास, निवेश और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के एजेंडे के साथ मैदान में है। वह रोजगार, उद्योग और कानून-व्यवस्था को मुख्य मुद्दा बना रही है। साथ ही बांग्लादेशी घुसपैठियों के जरिये राष्ट्रीयता के मुद्दे को हवा दे रही है, तो केंद्रीय योजनाओं और डबल इंजन सरकार के जरिए तेज विकास का दावा कर रही है। विश्लेषक कहते हैं बंगाल का चुनाव फिर यह साफ कर रहा है कि यहां सत्ता का फैसला किसी एक मुद्दे से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और वोट ट्रांसफर से होता है।उत्तर बंगाल में कुल 54 सीटें हैं। यह भाजपा का गढ़ माना जाता है। 2021 में उसे 30 सीटें मिली थीं, जबकि तृणमूल को 24। सीमावर्ती व पहाड़ी इलाकों में भाजपा ने मजबूत पकड़ बनाई। यही वह क्षेत्र था, जिसने उसे बंगाल में मुख्य विप …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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