भारतीय राजदूत ने संयुक्त राष्ट्र को भी आईना दिखाते हुए कहा, ‘संयुक्त राष्ट्र की परिकल्पना एक ऐसे संस्थान के रूप में की गई थी जो धर्म, संस्कृति और राजनीति से ऊपर उठकर काम करे। इसलिए हम ऐसे किसी भी ढांचे को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत पर जोर देते हैं, जो केवल एक धर्म पर ध्यान दे और धार्मिक भय (रिलिजियोफोबिया) की व्यापक समस्या पर ध्यान न दे। उन्होंने कहा, हमारे विचार में 1981 का ‘धर्म या आस्था के आधार पर सभी प्रकार की असहिष्णुता और भेदभाव के उन्मूलन संबंधी घोषणा’ एक संतुलित दस्तावेज है, जो किसी एक धर्म को विशेष महत्व दिए बिना सभी धर्मों को मानने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है।’ संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने कहा, ‘संयुक्त राष्ट्र को धार्मिक पहचान को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने और संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसका गलत इस्तेमाल किए जाने के प्रति आगाह रहना चाहिए और इन खतरों की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। #WATCH | Permanent Representative of India to the United Nations, Parvathaneni Harish, says, “As a nation where followers of virtually every major world religion coexist peacefully and a nation that has given birth to four major world religions namely Hinduism, Buddhism, Jainism… pic.twitter.com/zfz8HOKyCJ — ANI (@ANI) March 17, 2026 संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वथनेनी हरीश ने कहा, ‘भारत एक ऐसा देश है जहां दुनिया के लगभग सभी प्रमुख धर्मों को मानने वाले लोग शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रहते हैं। साथ ही, हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म जैसे चार प्रमुख धर् …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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