आयात कम करने की कोशिशों के बावजूद भारत की चीन पर यह निर्भरता क्यों? भारत ने सस्ते और खराब गुणवत्ता वाले आयात को रोकने के लिए कई कड़े मानक तय किए हैं, लेकिन देश की विनिर्माण गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए उद्योग अब भी भारी रूप से चीन पर निर्भर हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक से जुड़े सामान, भारी मशीनरी, रसायन और दवाओं से जुड़ी सामग्री (Pharma Ingredients) जैसी आवश्यक चीजों के लिए चीन पर आश्रित है। भारत और चीन के बीच व्यापार में भारी असंतुलन का बड़ा कारण क्या? एक तरफ भारत अपनी विनिर्माण जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर चीन के कच्चे पर निर्भर है, वहीं दूसरी तरफ चीन ने अपने देश में संरक्षणवादी नीतियां अपनाई हुई हैं। कई अपीलों के बावजूद, चीन कड़े निरीक्षण और मानकों का हवाला देकर भारतीय उत्पादों की अपने बाजार में एंट्री को प्रतिबंधित करता है, जिससे व्यापार एकतरफा हो गया है। क्या इस व्यापारिक स्थिति के बीच विदेशी निवेश नियमों में बदलाव किया गया? जी हां, भारत सरकार की ओर से निवेश के मोर्चे पर भी एक नीतिगत कदम उठाया गया है। उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) ने सोमवार को एफडीआई नीति (एफडीआई नीति) में बदलावों को अधिसूचित किया है। नए नियमों के तहत, अब 10% तक चीनी शेयरधारिता वाली विदेशी कंपनियों को ‘ऑटोमैटिक रूट’ के माध्यम से भारत में निवेश करने की अनुमति मिल गई है। चीन के साथ 102 अरब डॉलर का व्यापार घाटा यह साफ करता है कि घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के बावजूद, भारतीय सप्लाई चेन आज भी बुनियादी कच्चे माल के लिए चीनी आयात पर निर्भर है। स्मार्टफोन और पेट्रोलियम निर्यात में भारी उछाल सकारात्मक संकेत है, लेकिन आयात-निर्यात के अंतर को कम करने …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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