तीन देशों भुटान, नेपाल और बांग्लादेश से घिरे इस राज्य में भाजपा बीते ढाई दशक से कमल खिलाने का सपना पाले हुए है। बीते चुनाव में पार्टी वाम दलों और कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए मुख्य विपक्षी दल बनने में तो कामयाब रही, मगर सत्ता हासिल करने का सपना अधूरा ही रहा। इस बार वह घुसपैठ के कारण जनसांख्किीय बदलाव और भ्रष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाया है। साथ ही बीते चुनाव से सबक सीखते हुए पाला बदल करने वाले नेताओं की जगह खांटी कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ाने की रणनीति बनाई है।राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार पिछले चुनाव में लगभग 36 सीटों पर जीत का अंतर 5000 वोट से कम था। इनमें से कई सीटें ऐसी थीं जहां हार-जीत का फैसला कुछ सौ वोटों से हुआ। यही कारण है कि इन सीटों को आगामी चुनाव का सबसे अहम रणक्षेत्र माना जा रहा है। अगर इन सीटों पर थोड़े से वोटों का झुकाव बदलता है तो सत्ता का समीकरण भी बदल सकता है।भाजपा की रणनीति उत्तर बंगाल और जंगलमहल क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने की है। नॉर्थ बंगाल के कूचबिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग जैसे जिलों में भाजपा को पिछले चुनाव में अच्छी सफलता मिली थी। वहीं, ममता के नेतृत्व में तृणमूल सरकार सामाजिक और कल्याणकारी योजनाओं के सहारे उतर रही है। तृणमूल का दावा है कि महिलाओं, किसानों और गरीब तबकों के लिए चलाई गई योजनाओं ने उसे मजबूत जनसमर्थन दिलाया है।मुस्लिम वोट बैंक को साधे रखने के लिए ममता लगातार फ्रंट फुट पर खेल रही हैं। खासतौर पर एसआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट, सड़क और संसद में आक्रामक मोर्चा खोलना इसी वोट बैंक को साथ बनाए रखने की रणनीति है। बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा और तृणमूल के बीच मतों का अंतर सात फीसदी रहा है। भाजपा आदिवासी, मतुआ, …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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