आज का शब्द: मत्त और माखनलाल चतुर्वेदी की कविता- एक साथ चल ‘हिंदी हैं हम’ शब्द शृंखला में आज का शब्द है- मत्त, जिसका अर्थ है- मतवाला, प्रसन्न और निश्चिंत रहनेवाला, नशे में धुत्त। प्रस्तुत है माखनलाल चतुर्वेदी की कविता- एक साथ चल तू न तान की मरोर देख, एक साथ चल, तू न ज्ञान-गर्व-मत्त– शोर, देख साथ चल। सूझ की हिलोर की हिलोरबाज़ियाँ न खोज, तू न ध्येय की धरा– गुंजा, न तू जगा मनोज। तू न कर घमंड, अग्नि, जल, पवन, अनंग संग भूमि आसमान का चढ़े न अर्थ-हीन रंग। बात वह नहीं मनुष्य देवता बना फिरे, था कि राग-रंगियों– घिरा, बना-ठना फिरे। बात वह नहीं कि– बात का निचोड़ वेद हो, बात वह नहीं कि- बात में हज़ार भेद हो। स्वर्ग की तलाश में न भूमि-लोक भूल देख, खींच रक्त-बिंदुओं– भरी, हज़ार स्वर्ण-रेख। बुद्धि यन्त्र है, चला; न बुद्धि का गुलाम हो। सूझ अश्व है, चढ़े– चलो, कभी न शाम हो। शीश की लहर उठे– फसल कि, एक शीश दे। पीढ़ियाँ बरस उठें हज़ार शीश शीश ले। भारतीय नीलिमा जगे कि टूट-टूट बंद स्वप्न सत्य हों, बहार– गा उठे अमंद छन्द। हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें। 6 घंटे पहले …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

मूल लेख स्रोत पर पढ़ें