आज का शब्द: त्रिभुवन और नागार्जुन की कविता- सबके लेखे सदा सुलभ ‘हिंदी हैं हम’ शब्द शृंखला में आज का शब्द है- त्रिभुवन, जिसका अर्थ है- तीन लोक अर्थात् स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल। प्रस्तुत है नागार्जुन की कविता- सबके लेखे सदा सुलभ गाल-गाल पर दस-दस चुम्बन देह-देह को दो आलिंगन आदि सृष्टि का चंचल शिशु मैं त्रिभुवन का मैं परम पितामह व्यक्ति-व्यक्ति का निर्माता मैं ऋचा-ऋचा का उद्गाता मैं कहाँ नहीं हूँ, कौन नहीं हूँ अजी यही हूँ, अजी वहीं हूँ जहाँ चाहिए वहाँ मिलूँगा स्थापित कर लो, नहीं हिलूँगा उच्छृंखलता पर अनुशासन दया-धरम पर मैं हूँ राशन सबके लेखे सदा-सुलभ मैं अति दुर्लभ मैं, अति दुर्लभ मैं महाकाल भी निगल न पाए वामन हूँ मैं, मैं विराट हूँ मैं विराट हूँ, मैं वामन हूँ हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें। 5 घंटे पहले …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
आज का शब्द: त्रिभुवन और नागार्जुन की कविता- सबके लेखे सदा सुलभ
आज का शब्द: त्रिभुवन और नागार्जुन की कविता- सबके लेखे सदा सुलभ 'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- त्रिभुवन, जिसका अर्थ है- तीन लोक अर्थात् स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल। प्रस्तुत है नागार्जुन की कविता- सबके लेखे सदा सुलभ गाल-गाल पर दस-दस चुम्बन देह-देह को दो आलिंगन आदि सृष्टि का चंचल शिशु मैं त्रिभुवन का मैं परम पितामह व्यक्ति-व्यक्ति का निर्माता मैं ऋचा-ऋचा का उद्गाता मैं कहाँ नहीं हूँ, कौन नहीं हूँ अजी यही हूँ, अजी वहीं हूँ जहाँ चाहिए वहाँ मिलूँगा स्थापित कर लो, नहीं हिलूँगा उच्छृंखलता पर