आज का शब्द: अकूल और केदारनाथ अग्रवाल की कविता- सुबह और शाम ‘हिंदी हैं हम’ शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अकूल, जिसका अर्थ है- जिसका कोई कूल, किनारा या अंत न हो, असीम। प्रस्तुत है केदारनाथ अग्रवाल की कविता- सुबह और शाम मैंने उसको हँसते देखा; उसके गालों पर गुलाब को खिलते देखा; वह अकूल अनुराग-पुलक-सी- दूर खड़ी भी पास खड़ी थी। वह मेरी रंगीन सुबह थी!! बस, फिर मेरी ट्रेन चली थी। प्लेटफार्म पर सुबह सुनहरी छूट गई थी। दिन की यात्रा- धूल-धुएँ के बीच हुई थी। एक बार फिर, बरसों बीते, मैंने उसको नदी किनारे गुमसुम देखा; उसके गालों के गुलाब सब सूख गए थे; दूर खड़ी भी पास खड़ी थी। वह मेरी सुनसान शाम थी॥ हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें। 7 घंटे पहले …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
आज का शब्द: अकूल और केदारनाथ अग्रवाल की कविता- सुबह और शाम
आज का शब्द: अकूल और केदारनाथ अग्रवाल की कविता- सुबह और शाम 'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अकूल, जिसका अर्थ है- जिसका कोई कूल, किनारा या अंत न हो, असीम। प्रस्तुत है केदारनाथ अग्रवाल की कविता- सुबह और शाम मैंने उसको हँसते देखा; उसके गालों पर गुलाब को खिलते देखा; वह अकूल अनुराग-पुलक-सी- दूर खड़ी भी पास खड़ी थी। वह मेरी रंगीन सुबह थी!! बस, फिर मेरी ट्रेन चली थी। प्लेटफार्म पर सुबह सुनहरी छूट गई थी। दिन की यात्रा- धूल-धुएँ के बीच हुई थी। एक बार फिर, बरसों बीते, मैंने उसको नदी किनारे गु