वे यहां नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के 18वें दीक्षांत समारोह में “फ्रॉम फोर्ट्रेस टू फोरम: लॉ इन एन अनफिनिश्ड रिपब्लिक” विषय पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने युवा विधि पेशेवरों से आह्वान किया कि वे कानून को एक बंद दुर्ग के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत और विकसित होते सार्वजनिक मंच के रूप में देखें।मुख्य न्यायाधीश ने कानून की ऐतिहासिक यात्रा को समझाने के लिए मेहरानगढ़ किले का उल्लेख एक सशक्त रूपक के रूप में किया। उन्होंने कहा कि एक किला अव्यवस्था और अनिश्चितता से रक्षा के लिए बनाया जाता है। प्रारंभिक अवधारणा में कानून भी कुछ ऐसा ही था, जो समाज को अराजकता और मनमानी से बचाने के लिए खड़ा किया गया।हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि एक संवैधानिक लोकतंत्र में कानून केवल किला बनकर नहीं रह सकता। उसे ऐसे मंच में परिवर्तित होना होगा जहां असहमतियों पर विचार-विमर्श हो, अधिकारों को स्वर मिले और सत्ता को तर्कसंगत ढंग से जवाबदेह बनाया जाए।सूर्य कांत ने कहा कि ‘किले से मंच’ की यह यात्रा केवल कानूनी व्यवस्थाओं के विकास को ही नहीं दर्शाती, बल्कि स्नातक हो रहे विद्यार्थियों की जिम्मेदारी को भी रेखांकित करती है। उन्होंने विद्यार्थियों को चेताया कि वे कानून को एक पूर्ण या अंतिम उत्पाद के रूप में न देखें। कुछ विज्ञानों के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत, कानून में अंतिमता नहीं होती।जस्टिस ओलिवर वेंडेल होम्स जूनियर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कानून का जीवन तर्क से अधिक अनुभव में निहित रहा है। समाज बदलता है, इसलिए कानून भी विकसित होता है और उसकी वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि वह परिवर्तन के साथ किस तरह संवाद करता है।मुख्य न्यायाधीश ने इतिहास का उल्लेख करते हुए ‘मैग्ना कार्टा’ को इस सिद् …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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