आज का शब्द: पसार और बुद्धिनाथ मिश्र की कविता- फूल झरे ‘हिंदी हैं हम’ शब्द शृंखला में आज का शब्द है- पसार, जिसका अर्थ है- प्रसार, फैलाव, लंबाई, चौड़ाई, दालान। प्रस्तुत है बुद्धिनाथ मिश्र की कविता- फूल झरे फूल झरे जोगिन के द्वार हरी-हरी अँजुरी में भर-भर के प्रीत नई रात करे चाँद की गुहार । केसर-क्यारी से बहकी हिरना साँवरी ठुमुक-ठुमुक चले कहीं रुके नहीं पाँव री कहाँ तेरा हाट-बाट कहाँ तेरा गाँव री ? बादल की चुनरी पसार काँप-काँप, अंग-छवि बावरी अँजोरिया ताल में निहारे बार-बार । पीपर की छाँह बसे छुई-मुई प्रीत रे अधरों से झाँक रहे अधसँवरे गीत रे अनजाने नाम लिखे सीपियों के मीत रे रेत भरे तीर को बुहार रोम-रोम से अधीर दर्द सब निचोड़ कौन भेज रहा प्रिया को दुलार । बगुले-सी आस तिरे मन में दिन-रैन रे धनही पगडंडी पर बिछुआ बेचैन रे सुलझ रहे स्वप्न-बंध उलझ रहे नैन रे कौन परी तोड़ गयी हार! एक-एक पंखुरी पर अल्पना रचा गयी बाँसुरी सुना गयी मल्हार । हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें। 5 घंटे पहले …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
आज का शब्द: पसार और बुद्धिनाथ मिश्र की कविता- फूल झरे
आज का शब्द: पसार और बुद्धिनाथ मिश्र की कविता- फूल झरे 'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- पसार, जिसका अर्थ है- प्रसार, फैलाव, लंबाई, चौड़ाई, दालान। प्रस्तुत है बुद्धिनाथ मिश्र की कविता- फूल झरे फूल झरे जोगिन के द्वार हरी-हरी अँजुरी में भर-भर के प्रीत नई रात करे चाँद की गुहार । केसर-क्यारी से बहकी हिरना साँवरी ठुमुक-ठुमुक चले कहीं रुके नहीं पाँव री कहाँ तेरा हाट-बाट कहाँ तेरा गाँव री ? बादल की चुनरी पसार काँप-काँप, अंग-छवि बावरी अँजोरिया ताल में निहारे बार-बार । पीपर की छाँह बसे छुई-मुई