14 फरवरी 2019…। धमाका…। 40 सीआरपीएफ के जवान बलिदान हो गए। सारा देश गम और गुस्से से उबल पड़ा। पुलवामा में गम-गुस्से के साथ ही खौफ का साया भी था। पर…? हमारे सुरक्षा बलों के संकल्प, शौर्य, मुस्तैदी और सामरिक रणनीति की बदौलत पुलवामा की फिजा बदली है। अब यहां हर सुबह हर दिन उम्मीद की नई कहानी लिखी जा रही है। स्कूल-काॅलेज जाते बच्चे हों या सुकून से दुकानदारी करते कारोबारी…बदलाव की कहानी हर तरफ नजर आने लगी है। पुलवामा हमले का गवाह राष्ट्रीय राजमार्ग-44 का वो हिस्सा भी बदल गया है। यहां फार्म हाउस और कारखाने लग गए हैं। इनमें दूसरे प्रदेशों के भी उद्यमी हैं। उद्यमियों के आंखों की चमक बता देती है कि कश्मीर का आनंद और केसर वैली के रूप में विख्यात इस शहर के लोग अब घुट-घुट कर नहीं खुली हवा में सांस ले रहे हैं।जहां हमला हुआ था, उसी के पास जाविद अहमद की ड्राई फ्रूट की दुकान है। जाविद कहते हैं जो जवान बलिदान हुए वे हमारे भाई थे। हमले के बाद हम सदमे में थे। पर्यटक कश्मीर नहीं आ रहे थे। बीते तीन-चार वर्षों से हालात बदले हैं। घाटी में पर्यटकों के बढ़ने से हमारा व्यवसाय भी पटरी पर आ गया है। हम सेना, सीआरपीएफ के जवानों के आभारी हैं जो दिन-रात हमारे राजमार्गों की रखवाली कर रहे हैं।उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर के रहने वाले शब्बीर अहमद कहते हैं कि हमने तो वो दौर भी देखा है जब कश्मीर में आग लगी होती थी। हमारा इस प्रदेश और इस शहर से गहरा ताल्लुक है। हमारा परिवार यहां भी रहता है। एक वक्त था जब हम अपने घर के सभी नौ बच्चों को यहां से बाहर ले गए। उनके सुरक्षित भविष्य के लिए हमें यह कदम उठाना पड़ा। आखिर वक्त ने करवट ली। हमने महसूस किया कि बारूद की गंध मिट चुकी है और केसर की सुगंध फ …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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