भारत में खुदरा महंगाई मापने के पैमाने यानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में हाल ही में किए गए बदलावों ने अर्थशास्त्रियों और बाजार विश्लेषकों का ध्यान खींचा है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की नवीनतम रिपोर्ट ने सीपीआई के नए गणना तरीके में बाजारों के चयन पर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, नए इंडेक्स में शामिल किए गए नए बाजारों का वितरण भौगोलिक रूप से असंतुलित है, जिसमें उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र का गैरवाजिब रूप में दबदबा है। यह गड़बड़ी देश की महंगाई की वास्तविक तस्वीर को धुंधला कर सकती है। नए बाजारों पर निर्भरता: पुरानी 2012 की सीरीज के मुकाबले नई सीरीज में कुल 565 नए ग्रामीण और शहरी बाजारों को जोड़ा गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन 565 नए बाजारों में से अकेले 43% हिस्सेदारी केवल दो राज्यों उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से हैं। पुरानी 2012 की सीरीज के मुकाबले नई सीरीज में कुल 565 नए ग्रामीण और शहरी बाजारों को जोड़ा गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन 565 नए बाजारों में से अकेले 43% हिस्सेदारी केवल दो राज्यों उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से हैं। असंतुलित प्रतिनिधित्व: रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया है कि नए बाजारों प्रतिनिधित्व बहुत हद तक असमान है और यह कुछ खास राज्यों की ओर झुका हुआ है।" इसका सीधा मतलब है कि राष्ट्रीय महंगाई दर पर इन दो राज्यों की कीमतों का असर जरूरत से अधिक हो सकता है। सरकार ने महंगाई के आंकड़ों को ज्यादा सटीक बनाने के लिए सीपीआई-2024 सीरीज पेश की है, जिसमें भौगोलिक कवरेज और वस्तुओं की संख्या बढ़ाई गई है। हालांकि, एसबीआई की रिपोर्ट इस विस्तार की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करती है: सीपीआई बास्केट से क्या बाहर क्या-अंदर? महंगाई की गणना क …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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