संसद का मौजूदा बजट सत्र टकराव और नैरेटिव गढ़ने की जंग का मैदान बन गया है। राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा पूर्व सेना अध्यक्ष एम.एम. नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक का जिक्र करने से सदन में भारी हंगामा हुआ। गतिरोध पूरे हफ्ते चलता रहा। सत्ता पक्ष और विपक्ष ने अपने-अपने राजनीतिक फायदे के हिसाब से पूरे मुद्दे को भुनाने की कोशिश की। इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ के मंच पर इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल सिंह, राकेश शुक्ल अनुराग वर्मा, बिलाल सब्जवारी और पीयूष पंत मौजूद रहे। जब नाम के साथ गांधी सरनेम जुड़ जाता है तो उस नाम की एोगेंस का लेवल डिफरेंट हो जाता है। हर संसद सत्र में वो एक मुद्दा दे देते हैं। वो पत्रकारों को विषय देते हैं और सरकार को भी व्यस्त रखते हैं। खबरों में बने रहने का जो इनकी नई कला है वह लेफ्ट से आई है। कांग्रेस अब ‘सेंटर’ की अपनी ताकत खो चुकी है और राहुल गांधी के नेतृत्व में केवल हेडलाइंस बनाने के लिए लेफ्ट की वैचारिक जमीन पर खड़ी है। बिलाल सब्जवारी: संसद एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां पर पूरे देश के अंदर संदेश दे सकते हैं और राजनीति चलती ही नैरेटिव पे है। अगर कोई मुद्दा राहुल गांधी उठाते हैं तो उसे सुना तो जाना चाहिए। राहुल के मुद्दे सत्ता पक्ष को एक डिफेंसिव ग्राउंड पर ले जाते हैं। राहुल जिस तरह की राजनीति करते हैं वो जिस तरह के मुद्दे उठाते हैं उस पर विवाद होते रहते हैं। जहां तक नियम का सवाल रहा तो ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां राहुल को नियमों के होते हुए भी रोक दिया जाता है। ये सही है कि राहुल को नियम के तहत ही मुद्दों को उठाना चाहिए। राहुल गांधी एक नरेटिव गढ़ने को कोशिश कर रहे …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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