आज का शब्द: रेणु और शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की कविता- व्याकुल वसुंधरा की काया ‘हिंदी हैं हम’ शब्द शृंखला में आज का शब्द है- रेणु, जिसका अर्थ है- धूल, बालू,कण। प्रस्तुत है शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की कविता- व्याकुल वसुंधरा की काया लौह-पदाघातों से मर्दित हय-गज-तोप-टैंक से खौंदी रक्तधार से सिंचित पंकिल युगों-युगों से कुचली रौंदी। व्याकुल वसुंधरा की काया नव-निर्माण नयन में छाया। कण-कण सिहर उठे अणु-अणु ने सहस्राक्ष अंबर को ताका शेषनाग फूत्कार उठे साँसों से निःसृत अग्नि-शलाका। धुआँधार नभी का वक्षस्थल उठे बवंडर, आँधी आई, पदमर्दिता रेणु अकुलाकर छाती पर, मस्तक पर छाई। हिले चरण, मतिहरण आततायी का अंतर थर-थर काँपा भूसुत जगे तीन डग में । बावन ने तीन लोक फिर नापा। धरा गर्विता हुई सिंधु की छाती डोल उठी है। आज देश की मिट्टी बोल उठी है। आज विदेशी बहेलिए को उपवन ने ललकारा कातर-कंठ क्रौंचिनी चीख़ी कहाँ गया हत्यारा? कण-कण में विद्रोह जग पड़ा शांति क्रांति बन बैठी, अंकुर-अंकुर शीश उठाए डाल-डाल तन बैठी। कोकिल कुहुक उठी चातक की चाह आग सुलगाए शांति-स्नेह-सुख-हंता दंभी पामर भाग न जाए। संध्या-स्नेह-सँयोग-सुनहला चिर वियोग सा छूटा युग-तमसा-तट खड़े मूक कवि का पहला स्वर फूटा। ठहर आततायी, हिंसक पशु रक्त पिपासु प्रवंचक हरे भरे वन के दावानल क्रूर कुटिल विध्वंसक। देख न सका सृष्टि शोभा वर सुख-समतामय जीवन ठट्ठा मार हँस रहा बर्बर सुन जगती का क्रंदन। घृणित लुटेरे, शोषक समझा पर धन-हरण बपौती तिनका-तिनका खड़ा दे रहा तुझको खुली चुनौती। जर्जर-कंकालों पर वैभव का प्रासाद बसाया भूखे मुख से कौर छीनते तू न तनिक शरमाया। तेरे कारण मिटी मनुजता माँग-मा …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
आज का शब्द: रेणु और शिवमंगल सिंह 'सुमन' की कविता- व्याकुल वसुंधरा की काया
आज का शब्द: रेणु और शिवमंगल सिंह 'सुमन' की कविता- व्याकुल वसुंधरा की काया 'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- रेणु, जिसका अर्थ है- धूल, बालू,कण। प्रस्तुत है शिवमंगल सिंह 'सुमन' की कविता- व्याकुल वसुंधरा की काया लौह-पदाघातों से मर्दित हय-गज-तोप-टैंक से खौंदी रक्तधार से सिंचित पंकिल युगों-युगों से कुचली रौंदी। व्याकुल वसुंधरा की काया नव-निर्माण नयन में छाया। कण-कण सिहर उठे अणु-अणु ने सहस्राक्ष अंबर को ताका शेषनाग फूत्कार उठे साँसों से निःसृत अग्नि-शलाका। धुआँधार नभी का वक्षस्थल उठे बवंडर