अमेरिका ने क्यों लिया यह फैसला? राष्ट्रपति ट्रंप ने पदभार संभालने के बाद एक कार्यकारी आदेश में कोरोना महामारी के कुप्रबंधन और आवश्यक सुधारों में विफलता का हवाला देते हुए WHO से हटने का एलान किया था। प्रशासन की शिकायतों में यह भी कहा गया 1948 में संगठन के निर्माण के बाद से इसके नौ मुख्य अधिकारियों में से कोई भी अमेरिकी नहीं रहा है, जबकि अमेरिका इसका सबसे बड़ा फाइनेंसर रहा। साथ ही, महामारी के दौरान WHO की गलतियों, जैसे मास्क न पहनने की सलाह और COVID-19 के एयरबोर्न (हवा से फैलने वाले) होने से इनकार करना (जिसे 2024 तक आधिकारिक रूप से नहीं बदला गया), को भी कारण बताया गया है। इन्फेक्शियस डिजीज सोसाइटी ऑफ अमेरिका के अध्यक्ष डॉ. रोनाल्ड नहास ने अमेरका के WHO से बाहर होने के फैसले को अदूरदर्शी और वैज्ञानिक रूप से लापरवाह करार दिया है। वहीं, लॉरेंस गोस्टिन ने इसे किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से लिया गया सबसे खराब फैसला बताया है। अमेरिका का यह कदम केवल एक कूटनीतिक बदलाव नहीं है, बल्कि उसे इसके दूरगामी आर्थिक परिणाम भी झेलने पड़ सकते हैं। इस इससे WHO की वित्तीय हालत खस्ता हागी वहीं अमेरिकी फार्मा सेक्टर वैश्विक डेटा नेटवर्क से अलग-थलग पड़ जाएगा। अब देखना यह होगा कि क्या अमेरिका द्विपक्षीय समझौतों के जरिए इस खाई को पाट पाता है या यह फैसला स्वास्थ्य सुरक्षा के लिहाज से महंगा साबित होगा। …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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