राज्यपाल के जाने के बाद मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने उनकी कड़ी आलोचना की। स्टालिन ने कहा कि राज्यपाल ने नियमों और परंपराओं को तोड़ा है। यह उस ऊंचे पद की गरिमा के खिलाफ है जिस पर वह बैठे हैं। उन्होंने इसे सदन और जनता का अपमान बताया।मुख्यमंत्री ने सदन में एक प्रस्ताव पेश किया। इसमें कहा गया कि राज्यपाल का भाषण न पढ़ना स्वीकार नहीं किया जाएगा। साथ ही, इसमें कहा गया कि केवल सरकार द्वारा तैयार किया गया टेक्स्ट जिसे स्पीकर एम अप्पावु ने तमिल में पढ़ा था, वही रिकॉर्ड में जाएगा। सदन द्वारा प्रस्ताव पारित करने के बाद, स्टालिन ने इसके लिए विधायकों को धन्यवाद दिया और कहा कि यह अच्छा नहीं है कि राज्यपाल हर साल सरकार द्वारा तैयार भाषण पढ़ने से इनकार करते हैं। कई राज्यों में राज्यपालों द्वारा परेशानी पैदा करना होता है और यह सिर्फ तमिलनाडु में नहीं होता है।मुख्यमंत्री ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 176 के तहत भाषण सरकार तैयार करती है और राज्यपाल को इसे पूरा पढ़ना चाहिए। उन्हें इसमें अपनी मर्जी से बदलाव करने या इसे छोड़ने का हक नहीं है। स्टालिन ने डीएमके संस्थापक अन्नादुरई की बात याद दिलाई कि “बकरी को दाढ़ी की जरूरत नहीं होती, वैसे ही राज्य को राज्यपाल की जरूरत नहीं है।” जब राज्यपाल सदन से जा रहे थे, तब सत्ताधारी पार्टी और उनके सहयोगी दलों के विधायकों ने जमकर नारेबाजी भी की।इसको लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने मंगलवार को कहा कि उनकी पार्टी संविधान में बदलाव लाने की कोशिश करेगी। वे चाहते हैं कि साल की शुरुआत में विधानसभा में राज्यपाल के भाषण को जरूरी बनाने वाला नियम हट जाए। इसके लिए वे संसद में दूसरी पार्टियों का समर्थन लेंगे। यह बयान तब आया जब राज्यपाल आर एन र …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

मूल लेख स्रोत पर पढ़ें