सोमनाथ की पवित्र भूमि पर स्वाभिमान पर्व में हिस्सा लेने का कुछ दिन पहले ही मुझे सुअवसर मिला। इस पर्व को हम वर्ष 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार साल पूरे होने पर मना रहे हैं। इस क्षण का साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से लोग सोमनाथ पहुंचे। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतवर्ष के लोग जहां अपने इतिहास और संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं, वहीं कभी हार ना मानने वाला साहस भी उनके जीवन की एक बड़ी विशेषता है। यही भावना उन्हें एक साथ जोड़ती भी है। वर्ष 2022 में वाराणसी की धरती पर काशी-तमिल संगमम की शुरुआत हुई थी। मुझे इसके उद्घाटन समारोह में शामिल होने का सौभाग्य मिला था। तब तमिलनाडु से आए लेखकों, विद्यार्थियों, कलाकारों, विद्वानों, किसानों और अतिथियों ने काशी के साथ साथ प्रयागराज और अयोध्या के दर्शन भी किए थे। इसके बाद के आयोजनों में इस पहल को और विस्तार दिया गया। इसका उद्देश्य यह था कि संगमम में समय-समय पर नए विषय जोड़े जाएं, नए और रचनात्मक तरीके अपनाए जाएं और इसमें लोगों की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा हो। प्रयास यह था कि ये आयोजन अपनी मूल भावना से जुड़े रहकर भी निरंतर आगे बढ़ता रहे। वर्ष 2023 के दूसरे आयोजन में टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया, ताकि यह सुनिश्चित हो कि भाषा इसमें बाधा ना बने। इस कार्यक्रम के दौरान मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से भी हुई, जो इससे पहले सौराष्ट्र-तमिल संगमम के दौरान सोमनाथ आए थे और इससे पहले काशी-तमिल संगमम के समय काशी भी गए थे। ऐसे मंचों को लेकर उनकी सकारात्मक सोच ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसलिए मैंने तय किया कि क्यों ना इस विषय पर अपने कुछ विचार साझा करूं।‘मन की बात’ के एक एपिसोड के दौरान मैंने कहा था कि अ …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)
संस्कृतियों को जोड़ने की पहल: बाबा विश्वनाथ से रामेश्वरम तक, एक भारत भावना का उत्सव है काशी-तमिल संगमम
सोमनाथ की पवित्र भूमि पर स्वाभिमान पर्व में हिस्सा लेने का कुछ दिन पहले ही मुझे सुअवसर मिला। इस पर्व को हम वर्ष 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार साल पूरे होने पर मना रहे हैं। इस क्षण का साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से लोग सोमनाथ पहुंचे। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतवर्ष के लोग जहां अपने इतिहास और संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं, वहीं कभी हार ना मानने वाला साहस भी उनके जीवन की एक बड़ी विशेषता है। यही भावना उन्हें एक साथ जोड़ती भी है। वर्ष 2022 में वाराणसी की धरती पर काशी-तमिल