क्विक कॉमर्स कंपनियों द्वारा ग्राहकों के लिए 10 मिनट में डिलीवरी के वादे को हटाने की कथित घोषणा का असर गिग वर्कर्स की जिंदगी पर फिलहाल बहुत कम दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय राजधानी में काम कर रहे डिलीवरी एजेंट्स का कहना है कि कमाई अब भी ज्यादा डिलीवरी करने पर ही निर्भर है, इसलिए तेज काम करने का दबाव जस का तस बना हुआ है। बीते साल क्रिसमस और नए साल की पूर्व संध्या पर गिग वर्कर्स ने हड़ताल कर यह मुद्दा उठाया था कि उनसे असुरक्षित तरीके से काम कराया जा रहा है, जबकि दुर्घटना की स्थिति में न तो पुख्ता सुरक्षा है और न ही स्थायी आय की गारंटी। डिलीवरी एजेंट्स का कहना है कि उन्हें 10 मिनट डिलीवरी ब्रांडिंग हटाने को लेकर कोई औपचारिक जानकारी नहीं दी गई है। एक एजेंट ने कहा अगर ऐसा होता भी है, तो हमारे लिए बहुत कम बदलेगा। अच्छा है कि हमारी आवाज सुनी जा रही है, लेकिन यह काफी नहीं है। एक अन्य डिलीवरी पार्टनर ने कहा कि संघर्ष अभी शुरू हुआ है। सरकार सुन रही है, यह अच्छी बात है। लेकिन जब तक सुरक्षित और तय भुगतान व्यवस्था नहीं बनेगी, तब तक हमारी लड़ाई खत्म नहीं होगी। अमेजन इंडिया वर्कर्स यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष धर्मेंद्र कुमार ने इस कदम का स्वागत किया, लेकिन कहा कि इससे बिजनेस मॉडल नहीं बदलता। उन्होंने कहा अब भी न तो न्यूनतम वेतन है, न बीमा और न ही सुरक्षा। ऊंची रेटिंग और इंसेंटिव के लालच में वर्कर्स 10–12 घंटे काम करने को मजबूर हैं। डिलीवरी एजेंट्स का कहना है कि न्यूनतम वेतन तय नहीं है और प्रति डिलीवरी भुगतान बेहद कम है। ऐसे में उन्हें प्लेटफॉर्म द्वारा दिए जाने वाले इंसेंटिव पर निर्भर रहना पड़ता है, जो न तो स्थायी होते हैं और न ही पारदर्शी। कई एजेंट्स ने पहचान उजागर न …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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