बीते कुछ वर्षों तक दिलीप घोष एक अजीब सियासी स्थिति में रहे। वह पार्टी में थे, लेकिन सक्रिय नहीं दिखते थे। उन्हें भाजपा की गाड़ी, ड्राइवर और केंद्रीय गृह मंत्रालय की सुरक्षा मिली रही, मगर प्रधानमंत्री की बंगाल रैलियों से लेकर बड़े संगठनात्मक कार्यक्रमों तक वे नजर नहीं आए। यहां तक राज्य इकाई की कार्ययोजना में भी उन्हें लगभग दरकिनार ही कर दिया गया था। पार्टी नेताओं का जवाब भी हमेशा गोलमोल रहा, ‘दिलीप घोष केंद्रीय नेता हैं, उनके बारे में फैसला केंद्रीय नेतृत्व करेगा।” वहीं घोष खुद कहते रहे कि ‘मैं पार्टी में हूं, कहीं गया नहीं हूं।‘31 दिसंबर को यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई, जब दिलीप घोष केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी के प्रमुख चुनावी रणनीतिकार अमित शाह की बैठक में शामिल हुए। पार्टी सूत्रों के मुताबिक उन्हें यह न्योता केंद्रीय पर्यवेक्षक सुनील बंसल के जरिए मिला। बीजेपी के जमीनी संगठन को खड़ा करने वाले इस अनुभवी नेता के लिए यह साफ संदेश था-इंतजार खत्म हुआ। इसका असर तेजी से फैला। जो फोन पहले शांत पड़े थे, वे फिर से बजने लगे। जो समर्थन निष्क्रिय हो गए थे, वे फिर से सक्रिय हो गए। आगंतुक पहले धीरे-धीरे, फिर भारी संख्या में लौटने लगे।भाजपा के एक पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष के मुताबिक, ‘2016 से 2021 के बीच बंगाल भाजपा में जो जोश था, वह दिलीप घोष की वजह से था। 2021 की हिंसा और उनके हटने के बाद कई कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर गया था। अब उनकी वापसी से वही तबका फिर सक्रिय हो रहा है।’ दिलीप घोष को बंगाल बीजेपी का सबसे सफल प्रदेश अध्यक्ष माना जाता है। उनके कार्यकाल में पार्टी 2016 में 3 सीटों से बढ़कर 2021 में 77 विधानसभा सीटों तक पहुंची और 2019 लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतीं।फिलहाल द …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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