अमर उजाला बतरस एक और हफ्ते आम लोगों की जिंदगी से जुड़े अहम मुद्दे के साथ हाजिर है। इस हफ्ते पॉडकास्ट में चर्चा हुई ट्रांसजेंडर्स और उनके अधिकारों से जुड़े मुद्दे पर। दरअसल, भारत में ट्रांसजेंडर्स के लिए कई अधिकारों का प्रावधान शुरुआत से रहा है। इसके लिए बड़े-बडे़ कानून बने हैं और सुप्रीम कोर्ट तक ने ट्रांसजेंडर्स के अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार को समय-समय पर आदेश दिए हैं। हालांकि, इन बातों का क्या असर हुआ है, इसका लेखा-जोखा शायद ही कहीं मिलता है। एंकर नंदिता कुदेशिया ने इस हफ्ते बतरस में इन्हीं मुद्दों पर दो विशेषज्ञों से बात की और जाना की आखिर ट्रांसजेंडर्स के हक की लड़ाई भारत में कहां तक पहुंची है और इसका क्या प्रभाव हुआ है। नंदिता कुदेशिया ने अमर उजाला के स्टूडियो में जिन दो विशेषज्ञों से चर्चा की, उनमें दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता हरप्रीत पुरी और TWEET फाउंडेशन की अभीना अहेर शामिल रहीं। दोनों ही विशेषज्ञों ने कई अहम सवालों के जवाब दिए। मसलन- एक ट्रांसजेंडर का सफर कितना मुश्किलों से भरा होता है? ट्रांसजेंडर के लिए बने कानून समय के साथ कैसे बदले? कानून अधिकार के बाद कितना बदला ट्रांस के लिए माहौल? 2019 के एक्ट की क्या -क्या कमियां हैं और कैसे सुधार कर सकते हैं? बतरस में विशेषज्ञों ने न सिर्फ इन सवालों के जवाब दिए, बल्कि यह भी बताया कि सामाजिक माहौल से ट्रांस कितना परेशान होते हैं। ट्रांस के साथ होने वाले अपराध में सजा के प्रावधान क्या और कितने सही हैं। कानून बनने के बाद भी ट्रांसजेंडर्स के साथ अपराध क्यों नहीं रुक रहे हैं और परिवार और समाज में ट्रांसजेंडर्स के लिए क्या बदलाव होना चाहिए। उनके साथ किस तह के अपराध होते हैं और समाज-सरकार उनके लिए किस तरह से सुधार को बढ़ाव …(पूरी खबर स्रोत पर पढ़ें)

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